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शआज़ाद-कथा बिक
जोज्ी दूर से एक ऊँचे दरस्त की शाख परवैदे लड़ाई का रंग देख रहे
थे, ओर चिह्ला रहे थे होशियार, होशियार ! यारो, कुछ खबर भी है। हाय
इस वक्त अगर तोड़ेदार बन्द्ृक होती तो परे के परे साफ कर देता ॥ इतने
में झाजाद पाशा ने देखा कि रूपी फौह के सामने एक हसीना कमर से
तश्वार छटकाए, द्वाथ में नेना लिए, घोड़े पर शान से बैठी सिपाहियों
को आगे बहने के लिये लछकार रही है । श्राजादु की उस पर निगाह पढ़ी
तो दिल में सोचे, खुदा इसे बुरी नगर से बचाए । यह तो एस काबिल ऐै
कि इसऊी पूजा करे । यह, भोर सेदान जंग ! हाय-हाय, ऐसा ने हो झि
उप्त पर किसी का हाथ पढ़ जाय ।
गजब की चोज है यह्‌ हुर्त, इनसाँ लाख वचता है;
मगर दिल खिंच ही जाता है तबीयत आ ही जाती है।
उस हधोना ने-जो आज़ाद को देखा तो यह शेर पढ़ा--
संभल के रखियो कदम राहे-इश्क में मजनूँ;
कि इस दयार में सौदा वरदनः पाई है ।
यह कहकर घोडा धढ़ाया आजाद के घोड़े की तरफ़ कुकी और
भुकते ही उत पर तलवार का चार फिया | झाजाद ने वार खाली दिया
भोर तवचार को च्वूम्र लिया । तुकों ने इस जोर से नारा मारा कि कोसों
तक मैदाव ग़ैँजने ऊूगा । मिस क्लारिया ने ऋण्छाकर घोड़े को फेरा और
चाहा कि बाजाद के दो हुकड़े कर दे, मगर जैते ही हाथ उठाया,आाजाद
ने अपने घोड़े को झागे बढ़ाया और तलवार को श्रपनी तऊूचार से रोककर
हाथ से उध्च परी का हाथ पकड़ लिया तुर्को ने फिर नारा सारा और रूछी
फेप गए। मिश् क्लात्सि भी रजाई और मारे थुस्से के ऋष्छाकर वार
करने लगों । बार चार चोट आतो था, मगर आज़ाद की यह ,कैफियत
थी कि कुछ चोर तशवार पर रोकों और कुछ खाली दीं । श्राज़ाद उससे
६०० 'आज़ाद-कथा
लड़ तो रहे थे, मयर वार करते दिरू काँपता था। एफ दुफ़ा उस शे-
दिल औरत ने ऐसा हाथ जमाया कि कोई टूपरा होता, तो इसकी छाश्
जमीन पर 'फडकती नज़र श्राती, मगर आज़ाद ने इस तरह बचाया कि
हाथ बि छकुल ख़ाली गया। जब उप्त खत; ने देखा कि आज़ाद ने पक
'चोट भी नहीं खाई तो किर कुँकलाकर इतते वार किए कि दम लेगा
भी मुशक्तिउ हो गया ।मगर आज़ाद ने हँख-हँसका चोर्टे बचाई।
आखिर उसने ऐसा तुला हुआ हाथ घोड़े की गरदन पर जमाया कि गरदून'
कटकर दर गिरी। आज़ाद फौरन ऋूद पड़े और चाहते थे कि डछडका
मिस्र क्थारिस्ता के हाथ से तलवार छीन ऊ कि उसने धोडे को चाबुक
जम्ताई: 'झौर अपने फोज की तरफ चली । भाज़ाद सेमलने भी न पाए
श्रेक्िघोड़ा हवा हो गया । आजाद घोड़े पर छटके रह गए ।
जब घोडा रूस की फ़ोज में दाखिछु हुआ तो रूसियों ने तीन बार
खुशी के ब्रावाजे लगाए और कोई' चालीस-पचास आदृमिये ने आजाद
को घेर छिया । दूस आदमियों ने एक हाथ पकड़ा, पाँच ने दुबरा हाथ।
दो-चार ने ठाँग ली । भाज़ाद बोढे--भाई, शगर मेरा ऐसा ही खौफ है
तो मेरे हथियार खोल लो और कद' कर दो । दस आदसिप्रो का पहरा
रहे । हम भागकर जायेंगे कहाँ? आगर छुस्दाशे यही हथकण्डे हैं तो दप-
एँच दिन में तुक॑ जवान आाउ-ही-आप बेंधे चले जाएँगे। मिथ क्लारिसा
की तरह पन्‍थह-बीस परियों मोर्चे पर जाये तो शायद तुझीं की तरफ़ से
गोलनठाज़ी ही बन्द हो जाय | '
! एुफ़ विपाही-टेंगे हुए चडे आए, सारी दिलेरी घी रह गई !
टुमता सिाही--याद री क्झारिपा ! क्‍या फुर्ती है !
आजाइ--इसनमे तो शक नहीं कि इव वक्त हंस शिकार हो गए ।
क्लारिसा की दा ने सार छालछा। * ।
लक
आज़ाद-कथा ६०१
एक अफुछर--आज हम रुम्दारी गिरफ्तारी का जश्न मनाएँगे ।
धाज़ाद-हम भी शरीक होंगे । भरा, क्छारिया भी नाचेंगी ? '
श्रफुसार- भजी वह झापको अँगुलियों पर नचार्वेगी। आप हैं किस
भरोसे ?
भाज़ाइ--भवच तो खुदा ही बचाप्‌ तो बचें । बुदे फंसे ।
तेरी गली में हम इस तरह से हैं आए हुए ;
शिकार हो कीई जिस तरह चोट खाए हुए ।
अफसर--अआज तो हम फ़ूले नहीं समाते । बड़े मुढ की फॉला ।
« श्राजाइ-अभी खुश हो छो, सगर हम साग जायेंगे । मिप्त
क्लारिसा को देखकर तबीपत ऊहराहई, साथ, चले आए ।
अफसर>-वाह, अच्छे जवामद हो ! आए छड़ने ओर थौरत को
देख फिसल पड़े | छूरमा कष्टों औरतों पर फिसला करते हैं !
भाज़ाद--बूढे हो यये हो न ! ऐसा तो कहा ही चाहो ।
अफुसए--हम तो आपकी शहसवारी की एड़ी धरम सुनते थे |! मगर
बात छुछ और ही निकली । अगर आप मेरे मेहमान न होते तो हम
आपकी मुंह पर कह देते कि जाप शोहदे हैं। भले श्रादमी, झुछ तो
गेरत चाहिए !
इतने में एक रूसी सिपाही ने आऊर पझ्फसर के हाथ में . एक
रख दिया। उसने पढा तो यह्ठ सज़म॒न था-- -
(१ ) डुस्स दिया जाता है कि मियां आज़ाद को साइपेरिया फे
उन मैदानों में सेआ जाय, जो सम्से ज़्यादा सर्द है।. , |
(२) जत्र तक यह हरादकी जिन्दा रहे, किसी से बोलने न पावे |
आगर किसी से बात करे तो दोमों पर सौ-छी बंत पढ़ें ।--. -
(३) खाना सिफ़ एक वक्त दिया जाय। एक दिन आध सेर
६०२ आज़ांद-कथा
बबाला हुआ साग ओर दूघरे दिन गुड़ और रोटी । पानी के त्तीन करेरे
रख दिए जायें, चाहे एक ही बार पी जाय चाहे दूघ बार पिए।
(४ ) दस सेर आटा रोज पीसे भौर दो घण्टे रोज दलेल बोली
जाय। चक्की का पाद सिर पर रखकर चक्तर ऊगाए। ज़रा दुमन
लेने पाए। .' 9 9
(५) हफ्ते में एक बोर बरफ़ में खड़ा कर दिया जाये और बारीक
कपडा पहनने को दिया जाय ।
आज़ाद--बात तो भ्रच्छी है, गरमी निकल जायगी।
अफसर--इस भरोसे भी न रहना । आधी रात को पिर पर पानी
का जडेड़ा रोज़ दिया जायंगा ।
आज़ाद मु द्द से तो हँस रहे थे, मगर दिल काँप रहा था कि खुदा
ही खेर करे । ऊपर से यह हुक्म आ गया तो फ़रियाद छिससे करें और
फरियाद करें भो तो सुनता कौन है ? बोले, खत्म हो गया--.था और
कुछ है ।
श्रफ्सर--तुम्हारे साथ इतनी रियायत्र की गई है कि अगर मिप्त
क्लारिसा रहम करें तो कोई हछकी सज़ा ढी जाय ।
भ्राजाद--तब तो चह्व ज़रूर ही माफ़ कर देंगी ।
* यह कदकर आज़ाद ने यह शेर पढ़ा--
खोल दी है जुल्फ किसने फूल से रुखसार पर
छा गई काली घटा है आनकर गुलजार पर |
अफपर-“भव सुम्हारे दीवानापन में हमें कोई शक्र न रहा ।

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